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योग दिवस पर राजेश चंद्र की कविता “भूख लगी है योगा कर”

भूख लगी है? योगा कर!

काम चाहिये? योगा कर!

क़र्ज़ बहुत है? योगा कर!

रोता क्यों है? योगा कर!

अनब्याही बेटी बैठी है?

घर में दरिद्रता पैठी है?

तेल नहीं है? नमक नहीं है?

दाल नहीं है? योगा कर!

दुर्दिन के बादल छाये हैं?

पन्द्रह लाख नहीं आये हैं?

जुमलों की बत्ती बनवा ले

डाल कान में! योगा कर!

किरकिट का बदला लेना है?

चीन-पाक को धो देना है?

गोमाता-भारतमाता का

जैकारा ले! योगा कर!

हर हर मोदी घर घर मोदी?

बैठा है अम्बानी गोदी?

बेच रहा है देश धड़ल्ले?

तेरा क्या बे? योगा कर!

-राजेश चन्द्र

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