अंतरराष्ट्रीय न्यूज़

‘चीनम् शरणम् गच्छामि’

BY, अरुण माहेश्वरी

अभी पूरी मोदी सरकार चीन की ओर रुख किये हुए है। मोदी खुद आगामी पांच हफ्तों में दो बार चीन जा रहे हैं । शी जिन से इस महीने अनौपचारिक मुलाकात करेंगे और फिर जून के महीने में औपचारिक । राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल ने तो चीन को अपना दूसरा घर ही बना रखा है । यहां तक कि चीन के चक्कर में सुषमा स्वराज का लगभग विस्मृत हो रहा विदेश मंत्री पद भी फिर से दृष्टि के दायरे में आ गया है । प्रधानमंत्री के जाने के पहले ही वे चीन पहुंच चुकी है ।

चीन ने साल भर पहले जब दुनिया के तकरीबन सत्तर से ज्यादा राष्ट्रों को साथ लेकर अपनी वन बेल्ट वन रोड (ओबोर) परियोजना के प्रारंभ का ऐलान किया था, तब मोदी पर ट्रंप सवार थे । वे उनमें अपनी छवि देख रहे थे । अपने राष्ट्रवाद की जीत । ट्रंप के माध्यम से अपने दक्षिणपंथ के भविष्य का रास्ता देख रहे थे । इसके अलावा, डोकलाम का संकट भी आ गया । कुल मिला कर, मोदी जी ने अपनी क्षेत्रीय श्रेष्ठता के चक्कर में चीन के उस प्रकल्प में शामिल होने के प्रस्ताव का कोई दाम नहीं लगाया । उल्टे उसे भारत-विरोधी लामबंदी तक बताने की कोशिश की गई ।

किसी महाशक्ति के डर से नहीं, शुद्ध रूप से परस्पर आर्थिक हितों के आधार पर राष्ट्रों के बीच वैश्विक सहयोग के ओबोर के उस प्रस्ताव से अलग रहने का वास्तविक अर्थ तो यह था कि आज की दुनिया के राष्ट्रों के बीच के गैर-बराबरी और अन्यायपूर्ण संबंधों की स्थिति से भारत का चिपके रहना । यह हमारी आजादी की लड़ाई के मूल्यों के विपरीत आरएसएस के विचारों के अनुकूल होने के साथ ही हमारे समग्र हितों के विरुद्ध था । एक प्रकार से प्रत्यक्ष तौर पर साम्राज्यवादियों के सहयोगी की भूमिका अदा करना था ।

हर कोई जानता है कि दुनिया में राष्ट्रों के बीच संबंधों का यदि हम बराबरी और न्याय के आधार पर पुनर्विन्यास करना चाहते हैं तो किसी को भी इस विश्व के ढांचे और इसके लिये काम कर रही विचारधारा की संरचना के बाहर जाकर विचार करना होगा । चीन ने अपने ओबोर प्रकल्प के जरिये तकरीबन सात ट्रीलियन डालर की लागत से दुनिया के राष्ट्रों को जोड़ कर आज से एक अलग दुनिया के विकल्प की दिशा में, भले छोटा ही क्यों न हो, कदम उठाने की पेशकश की थी । जो है उसी से बंधे रहना प्रभुत्वशालियों की अधीनता को स्वीकारने से भिन्न कुछ नहीं होता है । उसे तोड़ने में कमजोरों की मुक्ति होती है । कमजोरों के अपने शील का भी यही तकाजा है ।

आगामी 2019 में ओबोर के विषय पर ही चीन में जो अनेक राष्ट्रों की सभा होने वाली है, अभी लगता है कि उस सभा में शिरकत करने का मोदी सरकार मन बना रही है । तमाम ओहदाधारियों का चीन की दिशा में प्रस्थान उसके संकेत भी देता है । लेकिन मोदी के बारे में सबसे बड़ी परेशानी का सबब यह है कि इनका कोई भी काम सुविचारित नहीं होता है । संघ की पाठशाला में अज्ञान की उपासना के इन्हें जो संस्कार मिले हैं, वही इनके स्वतंत्र सोच के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है । इसीलिये एक प्रकार का तदर्थवाद उनके सोच का स्थायी और लगभग असाध्य सा रोग बन चुका है । इनके पास विश्व के समग्र ताने-बाने में अपने देश के कल्याण की निर्विकल्प दृष्टि और दिशा का सर्वथा अभाव है ।

जैसे आंतरिक नीतियों के मामले में भी इन्हें सांप्रदायिक और जातिवादी विद्वेष फैलाने से जरा भी परहेज नहीं होता, जबकि कसमें खाते हैं राष्ट्रीय एकता और अखंडता की ! उसी प्रकार, हमेशा नितांत क्षणिक और तात्कालिक लाभ उठाने के दांव-पेंचों के बाहर ये कुछ भी नहीं सोच पाते हैं । हरेक चुनाव के साथ, वे भले किसी पंचायत के तुनाव हो, या नगरपालिका या विधान सभा या लोक सभा की एकाध सीट के चुनाव हो, ये तमाम नीतिगत मसलों पर भी गिरगिट की तरह रंग बदलते रहते हैं ।

आंतरिक राजनीति के क्षेत्र में तो मुमकिन है कि इस प्रकार के प्रति क्षण रूप बदलने वाले अवसरवाद से यदा-कदा कुछ तात्कालिक राजनीतिक लाभ मिल जाते हैं, लेकिन कूटनीति का क्षेत्र ऐसा है जिसमें आपको पूरी तरह से स्वतंत्र और सार्वभौम राज्यों से व्यवहार करना पड़ता है । इसमें आपके चरित्र की इस प्रकार की अविश्वसनीयता आपकी पूर्ण विफलता को ही सुनिश्चित करती है । मोदी की विदेश नीति इसीलिये अब तक एक पूरी तरह से विफल विदेश नीति रही है जिसमें आज पड़ौसी मुल्क हो या दुनिया के दूसरे हिस्सों के मुल्क, भारत को कोई भी अपना विश्वासयोग्य सहयोगी नहीं मानता है ।

चीन के प्रस्ताव के प्रति भारत की अब तक की उदासीनता को चीन ने भारत सरकार की एक विसंगति समझ कर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इसके विपरीत उसने भारत के सभी पड़ौसी देशों को धीरे-धीरे अपने विश्वास के दायरे में ले लिया । यहां तक कि भारत ने जिस भूटान की सार्वभौमिकता की रक्षा के नाम पर डोकलाम में भैरव नृत्य किया था, उसने भी भारतीय दम-खम की असलियत को देख लिया । अभी तो डोकलाम भारत सरकार के एजेंडे से ही बाहर हो गया है ।

कहने का तात्पर्य सिर्फ यह है कि भारत का चीन के साथ संबंधों का बढ़ना निश्चित तौर पर इस दुनिया, और खास तौर पर एशिया के राजनीतिक नक्शे को काफी प्रभावित करेगा । साम्राज्यवादियों की जकड़ को थोड़ा ढीला करेगा । लेकिन इन संबंधों के सुफल किसी भी प्रकार के तदर्थवाद के बजाय एक सुचिंतित नीति को अपनाये जाने पर टिके हुए हैं । अन्यथा, यदि इनके पीछे आंतरिक राजनीति में अपनी दुर्दशा से निकलने के लिये कोई नई और अल्पजीवी चमक पैदा करने की मंशा काम कर रही हो तो मोदी सरकार का चीन की ओर चल रहा यह अभियान एक नाटक भर साबित होगा । चीन के प्रस्तावित एक नये विश्व में भी आपकी उपस्थिति को कोई भी एक भरोसेमंद उपस्थिति के रूप में नहीं देख पायेगा और कुल जमा यह होगा कि इस विश्व में आपका अलग-थलगपन और ज्यादा बढ़ जायेगा। मोदी की नाटकीयताओं में इस बात का पूरा खतरा है।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं और आजकल कोलकाता में रहते हैं।)

Comments
To Top