तस्वीर कुछ कहती है

मैं एक शायर ! जो बेबसों के लिए ज़माने से लड़ रहा हूँ

मैं मर के जीना सिखा रहा हूँ, मैं जी के मरना सिखा रहा हूँ !

मैं तेज़ तूफ़ॉं में ज़िंदगी को तलाश करना सिखा रहा हूँ !

समंदरों से ये कोई कह दे, ग़ुरूर को रख दें साहिलों पर

मैं इन थपेडों में अपनी कश्ती को पार उतरना सिखा रहा हूँ !

नज़र में हो आग वलवलों की तो हर अदा में हो एक तेवर

मैं हुस्न वालों को इक नए तौर से संवरना सिखा रहा हूँ

ये ज़ुल्म की ये सितम की बारिश है और सहमे हुए ये दिल हैं

इन्हें मैं हिम्मत के चिकने रस्तों पे पाँव धरना सिखा रहा हूँ !

मैं एक शायर जो बेबसों के लिए ज़माने से लड़ रहा हूँ

मैं एक तिनका हूँ डूबतों का उन्हें उभरना सिखा रहा हूँ !!

 

 

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