मुद्दा

जिन्ना की तस्वीर, इसे हटाने की मांग अचानक अब क्यों?

BY, कुलदीप सहगल

AMU में ‘जिन्ना’ यानी माहौल को चार्ज करने का पूरा मसाला. बस वही सब सुना जाएगा जिसे सुनने के मकसद से अलीगढ़ के बीजेपी सांसद सतीश गौतम ने AMU के VC को चिट्ठी लिखी कि यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर क्यों लगी है?…

अब कोई तथ्य बताने की कोशिश करेगा तो उसे ‘देशद्रोही’, ‘जिन्ना समर्थक’, ‘पाक परस्त’ क़रार देने मे पलक झपकने की भी देर नहीं लगाई जाएगी…क्योंकि ये सवाल उठाया ही इसलिए गया लगता है. लेकिन तथ्य तथ्य ही रहेंगे और इतिहास इतिहास ही रहेगा.

हां, राजनीतिक मंशा ज़रूर इन तथ्यों को सुनने से इनकार करेगी.

AMU के छात्र संघ के हॉल में लगी जिन्ना की तस्वीर को हटाने या ना हटाने का फैसला सरकार-प्रशासन का होना चाहिए, वही ये फैसला ले और AMU मैनेजमेंट को इस बारे में सूचित कर दे. शासन-प्रशासन ये भी सुनिश्चित करे कि इस मुद्दे पर किसी को राजनीतिक रोटियां सेकने का मौका ना मिले…

अब कुछ ये सवाल…

जिन्ना की तस्वीर AMU छात्र संघ के हॉल में 1938 से लगी है, इसे हटाने की मांग अचानक अब क्यों?

AMU छात्रसंघ स्वतंत्र संस्था है, जिस वक्त ये तस्वीर सेंट्रल हॉल में लगी थी, उस वक्त भारत अविभाजित था…उस दौर की कई नामचीन हस्तियों को उस दौर के समाज और देश में योगदान देने के लिए छात्र संघ की ओर से अपनी आजीवन सदस्यता से नवाजा गया…इनमें सर सैयद अहमद खान (AMU के संस्थापक), महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, जवाहर लाल नेहरू, रबीन्द्र नाथ टैगोर, डॉ बी आर अंबेडकर, सीवी रमन आदि शामिल थे…ये जिस समय हुआ उस समय की परिस्थितियों को देखते हुआ था…उस वक्त ना देश का बंटवारा हुआ था और ना ही पाकिस्तान अस्तित्व में आया था…

बीजेपी सांसद ने जिन्ना को बंटवारे का सूत्रधार बताते हुए तस्वीर का अभी तक लगे रहने का औचित्य पूछा है…यही तर्क है तो इस मांग को तो 14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान के अस्तित्व में आते ही उठा दिया जाना चाहिए था…देश की आज़ादी के 71वें साल में ये मांग क्यों?

इन 71 साल में करीब 13 साल केंद्र की सत्ता में वो पार्टी भी रही है जो अब भी देश की बागडोर संभाले हुए है…उसने पहले क्यों नहीं जिन्ना की इस तस्वीर को हटाने के लिए कदम उठाया…

अब ये बात दूसरी है कि जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग को बीजेपी नेता और यूपी की योगी सरकार में मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य ने ही बेतुका बता दिया है…मौर्य के क्या शब्द हैं उन्हे भी जान लीजिए…”जिन महापुरुषों का देश के निर्माण में हाथ रहा है उन पर कोई उंगली उठाता है तो यह बेहद घटिया बात है. देश के बंटवारे से पहले जिन्ना का योगदान भी इस देश में था. इस प्रकार के बकवास बयान, चाहे उनके दल के सांसद-विधायक दें या दूसरे दलों के, उनकी लोकतंत्र में मान्यता नहीं है.”

ये कहा जा सकता है कि स्वामी प्रसाद मौर्य बहुजन समाज पार्टी छोड़ बीजेपी में आए हैं इसलिए पार्टी की मूल विचारधारा से अलग बयान दे रहे हैं…ऐसे में जिन्होंने भी जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग की है वो पहले मौर्य को ही मंत्री पद से हटाने और बीजेपी से बाहर करने की मांग करें…आखिर वो कैसे जिन्ना के लिए बात करते समय महापुरुष जैसा शब्द इस्तेमाल कर सकते हैं…

चलिए मौर्य को छोड़िए, लाल कृष्ण आडवाणी तो बीजेपी के लौह पुरुष रहे हैं…पार्टी को 2 सीटों से सैकड़े की संख्या पार कराने में उनका महत्ती योगदान रहा है…वो क्यों नेता, विपक्ष होते हुए 2005 में पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाकर उन्हें धर्मनिरपेक्ष होने का सर्टिफिकेट दे आए थे…देश के पूर्व वित्त, रक्षा, विदेश मंत्री जसवंत सिंह ने 2009 में विमोचित अपनी किताब ‘जिन्ना: इंडिया, पार्टीशन, इंडिपेंडेंस’ में नेहरु-पटेल की आलोचना की थी और जिन्ना की प्रशंसा…जसवंत सिंह तो बीते 4 साल से बीमार हैं और जवाब देने की स्थिति में नहीं है लेकिन जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग करने वाले बीजेपी सांसद सतीश गौतम को आडवाणी से जरूर सवाल करना चाहिए कि वो क्यों जिन्ना की मजार पर गए थे….

जिन्ना की तस्वीर हटाने की मांग के साथ ही मुंबई के मालाबार हिल्स में स्थित अरबों रुपए के जिन्ना हाउस (साउथ कोर्ट) को भी ज़मींदोज़ करने की मांग करनी चाहिए, जिसका कब्ज़ा इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिसर्च (ICCR) के पास है. ढाई एकड़ में बने इस बंगले पर मुंबई के जमीन माफिया की नजर रही है. लेकिन आखिरकार यहां दक्षिण एशियाई संस्कृति का संग्रहालय बनाने का फैसला लिया गया…लेकिन अभी इस दिशा में ICCR को कदम उठाना है…

मुझे यहां 1999 का एक प्रकरण भी याद आ रहा है…अभिनेता दिलीप कुमार को 1998 में पाकिस्तान सरकार ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’ से नवाजा था…1999 में करगिल युद्ध हुआ, जो पाकिस्तान के तत्कालीन जनरल परवेज मुशर्रफ की हिमाकत का नतीजा था और जिसमें भारत की जांबाज़ सेना के शौर्य के आगे पाकिस्तानी सैनिकों को ऊंचे रणनीतिक स्थानों पर होने के बावजूद मुंह की खानी पड़ी थी…उस वक्त शिवसेना ने दिलीप कुमार पर बहुत दबाव बनाया था कि वो निशान-ए-इम्तियाज पाकिस्तान को वापस करें…उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे…दिलीप कुमार ने तब कहा था कि वे प्रधानमंत्री वाजपेयी पर ही छोड़ते हैं वो जो भी फैसला लेंगे वो उन्हें मंजूर होगा…तब वाजपेयी ने कहा था कि अभिनेता दिलीप कुमार के देशभक्त होने और उनकी राष्ट्र को लेकर प्रतिबद्धता पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता…वाजपेयी ने साथ ही कहा था कि ये अवार्ड आपका है और आप जैसा ठीक समझें वैसा करें…दिलीप कुमार ने वाजपेयी के इन शब्दों के बाद निशान-ए-इम्तियाज को वापस नहीं करने का फैसला किया था.

कभी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तो कभी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को सवालों के घेरे में लाया जा रहा है…दोनों विश्वविद्यालयों में अगर कुछ ग़लत तत्व रहे हैं या हैं तो उन्हें वहां से हटाने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए…इन विश्वविद्यालयों के छात्रों को भी ऐसे तत्वों से दूरी बनाते हुए उनका बहिष्कार करना चाहिए…लेकिन चंद गलत तत्व कुछ गलत कर रहे हैं तो उसकी सजा पूरे के पूरे संस्थान को क्यों, यहां पढ़ने वाले सारे छात्रों को क्यों?…JNU हो या AMU, संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश कोई भी करता है तो उसका नुकसान यहां के सभी छात्रों को उठाना पड़ता है…ये नहीं भूलना चाहिए कि उच्च कोटि की शिक्षा प्रदान करने में इन दोनों संस्थानों का जो योगदान है वो कभी नहीं मिटाया जा सकेगा…

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