अभी अभी

हमने तो उसी दिन जिन्नाह को हमेशा के लिए नकार दिया था जिस दिन हमने इस मुल्क़ को अपना मुल्क़ और तिरंगे को अपना मुस्तक़बिल चुना था

हमें ना तो जिन्नाह से कोई गरज़ है ना ही उसकी तस्वीरों से और ना ही हमें सावरकर और गोडसे की देश बांटने वाली विचारधारा से कोई सरोकार है। हमें जिन्नाह की याद दिलाने वाले ये बात हमेशा भूल जाते हैं की अगर हमें जिन्नाह की ही सुननी होती तब हमारे पुरखे कब का उसके साथ इस मुल्क़ को छोड़कर जा चुके होते। पर नहीं हमने जिन्नाह की तब भी नहीं सुनी थी जब वो चीख़ रहा था की मुसलमानों चले आओ ये है तुम्हारा मुल्क़ है और ना ही हम जिन्नाह को लेकर अब कोई बात सुनने वाले हैं। हमने उसी रोज़ जिन्नाह को अनसुना करके मौलाना अबुलकलाम आज़ाद को सुन लिया था और जिन्नाह के मुल्क़ को छोड़कर गांधी का देश चुन लिया था।

हमारे पुरखों ने हमारे मुस्तक़बिल का फैसला उसी दिन कर दिया था जब जामा मस्जिद के मिम्बर पर खड़े होकर मौलाना अबुलकलाम आज़ाद ने ये सदा बुलंद की थी की रुक जाओ मुसलमानों कहाँ जा रहे हो ये हिंदुस्तान ही तुम्हारा मुल्क़ है। हमारे पुरखों ने उसी दिन मोहम्मद अली जिन्नाह को हमेशा हमेशा के लिये नकार दिया था। हमारे पुरखों ने उसी दिन अपनी वाली नस्लों के लिये ये पैगाम दे दिया था की हिंदुस्तान की आन-बान और शान के लिये ख़ून के आख़री करते तक़ कोशिशें करने से मत हिचकिचाना, लालकिले की प्राचीर पर लहराता आज़ाद भारत के ये तिरंगा ही अब तुम्हारा मुस्तक़बिल है इसे हमेशा अपने सीनों से लगाकर रखना।

गाँधी के हत्यारे की मूर्तियां तुम लगाओ, सावरकर की आरती तुम उतारो, गाँधी और नेहरू को पानी पी-पी कर तुम कोसो, संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्ति तुम खंडित करो देश के संविधान की धज्जियां तुम उड़ाओ सब तुम करो और सवाल सारे हमसे पूछे जाएँ, जवाब सारे हमसे तलब किये जाएँ, कटघरे में हमें खड़ा किया जाए, सफाईयां हम देते फिरे क्यों आख़िर क्यों ? और आख़िर कब तक़ ? कोई तो चरमसीमा तय करो खुद की की नहीं इससे आगे तुम हम पर सवाल उठाना बंद कर दोगे, कुछ तो पैमाना तय करो की उस पैमाने पर खरा उतरने के बाद यकीं कर लोगे तुम हम पर, आख़िर कहीं तो आकर थमो।

कितने बहाने तलाशोगे हमारी देशभक्ति परखने को ? क्या-क्या चीजें ढूंढ कर लाओगे हमारी देशभक्ति का लिटमस पेपर टेस्ट करने को ? कब तक़ किसी जिन्नाह और किसी यासीन मालिक के बहाने कटघरे में खड़ा करोगे हमारी हुब्बुलवतनी को ? कितना खून बहाओगे हमारा ? कितनी लाशे बिछाओगे हमारी ? कितना ज़लील करोगे हमें ? कितने पत्थर फेकोगे हम पर ? कितने घर फूंकोगे हमारे ? कितने ताने मारोगे हमें ? और ये सब करके कितना सता लोगे हमें ? कितना रुला लोगे ? कितना दिल दुखा लोगे हमारा ?

लेकिन देखना एक दिन तुम्हारी नफ़रत वाली साज़िशें तुमसे पनाह मांग लेंगी की तुम क्यों बेसबब किसी पर कीचड़ उछालते हो। देखना एक दिन तुम्हारे हाथों का पत्थर खुद तुमसे कहेगा की अब बस भी कर ज़ालिम कब तक किसी बेगुनाह का खून बेसबब बहाता रहेगा। देखना एक दिन तुम्हारी फिज़ूल की कोशिशें खुद तुमसे कहेंगी की क्यों परेशान होता है पगले वो भी तेरी ही तरह से इस वतन से बेपनाह मोहब्बत करने वाला इसी भारत माँ की संतान है। देखना एक दिन हवाओं का रुख़ खुद तुम्हें रोक कर ये कहेगा की बस कर वर्ना ये आग़ अब तुझे भी झुलसा कर रख देगी।

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