अर्थव्यवस्था

दलित-आदिवासी और ग़रीब हुए, अत्याचारों में भारी बृद्धि, ग़रीब और ग़रीब, अमीर और अमीर

नई दिल्ली: केंद्र की मोदी सरकार की ओर से बीते बुधवार को लोकसभा में बताया गया कि देश में करीब 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवन यापन कर रहे हैं. अनुसूचित जनजाति के 45.3 प्रतिशत और अनुसूचित जाति के 31.5 प्रतिशत लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं. लोकसभा में जगदम्बिका पाल के प्रश्न के लिखित उत्तर में योजना राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने यह जानकारी दी.

योजना राज्य मंत्री ने कहा कि वर्ष 2011-12 के आंकड़े के मुताबिक देश में करीब 27 करोड़ लोग (21.92 फीसदी) ग़रीबी रेखा के नीचे जीपन यापन कर रहे हैं. अनुसूचित जनजाति के 45.3 फीसदी और अनुसूचित जाति के 31.5 फीसदी लोग ग़रीबी रेखा के नीचे हैं. उन्होंने कहा कि सरकार ने लोगों की ज़िंदगी में सुधार और गरीबी उन्मूलन के लिए कई क़दम उठाए हैं.

वहीं आपको यह भी बता दें कि दलित एट्रोसिटी ऐक्ट भी कमज़ोर हो गया है जिसका कोर्ट में सरकार द्वारा कोई प्रतिवाद नही किया गया की इस आर्थिक हालत में कोई दलित अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों को कैसे एक ऑफ़िस से दूसरे ऑफ़िस जाकर न्याय ले पाएगा. जबकि विगत चार सालों में दलितों पर होने वाले अत्याचारों में बेतहासा वृद्धि हुई है. ख़ुद सरकार ने मंगलवार को बताया कि वर्ष 2016 में देश भर में दलितों के खिलाफ भेदभाव और अपमान से जुड़े 40,774 मामले दर्ज किए गए.

लोकसभा में अर्जुन लाल मीणा के प्रश्न के लिखित उत्तर में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने यह जानकारी दी. मंत्री ने कहा कि वर्ष 2016 में देश में अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ भेदभाव और अपमान से जुड़े 40,774 मामले दर्ज किए गए.

उन्होंने कहा कि इस दौरान राजस्थान में ऐसे 5,134 मामले दर्ज किए. सदस्य ने पूरे देश विशेष रूप से राजस्थान से संबंधित आंकड़े की जानकारी मांगी थी. मंत्री ने यह भी बताया कि वर्ष 2015 में ऐसे 38,564 मामले दर्ज हुए थे, जिसमें राजस्थान में 5,911 मामले दर्ज किए गए.

 

वहीं आय असमानता के स्तर में भी भारी वृद्धि हुई है. अमीर और अमीर हो गए हैं ग़रीब और ग़रीब हो गए हैं. यह बताने की आवश्यता नही है कि इसमें सबसे ज़्यादा संख्या दलित और मुसलमानों की ही होगी. शीर्ष 0.1 प्रतिशत सबसे अमीर लोगों की कुल संपदा बढ़कर निचले 50 प्रतिशत लोगों की कुल संपदा से अधिक हो गई है. वर्ल्ड इनैक्वैलिटी लैब के अध्ययन के अनुसार भारत में आर्थिक असमानता काफी व्यापक है और यह 1980 के दशक से लगातार बढ़ रही है.

इसमें कहा गया है कि आय असमानता ऐतिहासिक रूप से काफी ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है. शीर्ष 0.1 प्रतिशत आमदनी वाले लोगों की कुल संपदा निचले 50 प्रतिशत लोगों से अधिक हो गई है. आय असमानता में बढ़ोतरी 1947 में देश की आज़ादी के 30 साल की तुलना में उलट है. उस समय आय असमानता काफी घटी थी और निचले 50 प्रतिशत लोगों की संपत्ति राष्ट्रीय औसत की तुलना में ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी थी.

इस रिपोर्ट को अर्थशास्त्रियों फाकुंडो एल्वारेडो, लुकास चांसल, थॉमस पिकेटी, इमानुअल साइज और गैब्रियल जकमैन ने संयोजित किया है. इसमें पिछले 40 बरस के दौरान वैश्विकरण के असमानता वाले प्रभाव को दर्शाया गया है.

रिपोर्ट कहती है कि साल 2014 में देश के शीर्ष एक प्रतिशत आय वाले लोगों के पास राष्ट्रीय आय का 22 प्रतिशत था. वहीं शीर्ष दस प्रतिशत के पास 56 प्रतिशत हिस्सा था. अध्ययन के अनुसार, 1982-83 में देश के शीर्ष एक प्रतिशत लोगों की आय अगले एक दशक में छह प्रतिशत से बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई. इस आय में साल 2000 तक 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई और साल 2014 में यह बढ़कर 23 प्रतिशत हो गई.

साल 2014 तक निचले तबके के 50 प्रतिशत लोगों की राष्ट्रीय आय जिसमें 39 करोड़ बालिग शामिल हैं, शीर्ष के एक प्रतिशत जिसमें 78 लाख लोग शामिल हैं, की आय का एक तिहाई रहा.

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