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एक शायर में अवाम सिर्फ़ शायरी देखती है,  लेकिन इमरान में अवाम “कल” देखती है

imran pratapgarhi

इमरान एक शायर! जिसकी नज़्में हुकूमतों को झुलसाने का काम करती हैं.

एक शायर जिसका तेवर ख़ालिस इंक़लाबी है, जिसे न झुकना आता है,न हुक्म मानना। उसका मिज़ाज ही बग़ावती है।
उसके चेहरे की मासूमियत किसी को भी दीवाना बना ले, उसका स्टारडम फिल्मी सितारों को पानी पानी कर दे।

वो एक गांव से निकल के जिस मुक़ाम तक खुद को ले आया है, वहां उसी रास्ते से पहुंचना  लगभग नामुमकिन सा है।

उसकी कलम मजबूरों और मजलूमों के लिए चलती हैं, वो आज जो है उसे अवाम ने बनाया,अवार्ड ने नही।

उसकी सीधी सपाट बातें जुल्मियों पे तमाचा हैं,
इल्ज़ाम है वो अदब का शायर नही, इल्ज़ाम ही बेतुका है, उसकी शायरी भाव नही क्रांति मांगती है,जो मजहबी,सियासती ठेकेदारों का मुखौटा नोचकर उन्हें नंगा करती है ।
हिंदुस्तान के मुशायरों में स्टारडम लाने की क्रेडिट अगर कुछ चुनिंदा शायरों को दिया जाए तो उसे पहली कतार में खड़ा किया जाएगा।
वो मुशायरों का शाहरुख है
वो शायरों का ‘हबीब जालिब’ है।

उसकी नज़्में अदबी कसौटियों पे ख़री न उतरते हुए भी सात समंदर पार पहुंच जाती हैं।
वो आम लफ़्ज़ों का शायर है, वो सीधी बातें करता है।
उसे इशारों में बातें कहने की आदत नही है,इसीलिए वो इमरान है।
कलमकारों की अक्सरियत जहां तटस्थता का चोला पहने खुद को महफूज़ करने की जद्दोजहद में मुब्तिला रहती है, वहीं उसने तटस्थता को ठोकर मारते हुए आलोचना को अपनाया है।
मुशायरों की महफ़िलें सजती हैं, सियासी, समाजी मठाधीशों का जमावड़ा होता है,
कोई महबूबा पे शेर कहता है,कोई इश्क़ की बातें करता है
ज़ुल्फ़ आँचल पे शायरी चल रही होती है कि आधी रात को हो हल्ला मचता है, मुशायरों के स्टेज और शायरों से नज़रें हटा के ऑडिएंस पीछे देखने लगती है, एक हीरो से दिखने वाले नौजवान का आगमन होता है, ज़िंदाबाद के नारे लगते हैं वो मंच पे आकर हाथ हिलाकर अभिवादन करता है,सब बैठ जाते हैं।
उसके हाथ मे माइक आता है,
वो पाकिस्तानी क्रांतिकारी शायर हबीब जालिब के लफ़्ज़ों में शुरुआत करता है…..

“कहीं गैस का धुआं है, कहीं गोलियों की बारिश
शब-ए-अहद-ए-कमनिगाही तुझे किस तरह सुनाएं”

“सब बढ़िया है, अच्छे दिन हैं” वाला झूठ बेनक़ाब हो जाता है। 
वो इमरान है, खौफ़ जिसके कलम के आसपास नही फटक पाती है, उसकी बग़ावती कलमकारी पहले मुशायरों से शुरू हुई और आज तक ज़ारी है।

वो कहता है,

मैं शायर हूँ इक शायर को सरकारों से क्या डरना।
मैं आग से लड़ने निकला हूँ अंगारों से क्या डरना।।

इमरान नाइंसाफी के ख़िलाफ़ इंसानी संघर्ष का चेहरा है,
उसकी आवाज़ जिसके पसमंजर में अवाम और मजलूमों की चीखें पैबस्त हैं, उन चीखों पे ध्यान देने के लिए हुकूमतों को सच मे मजबूर करने वाला नाम है इमरान।
ये शायर अलग ही मिट्टी का बनाया गया है,
ज़ुल्म, ज़्यादती, मुफ़लिसी और गैर-बराबरी की शिकार अवाम के दर्द को महसूस करना और उसे उतनी ही शिद्दत से लफ़्ज़ों में ढालके “क्या खाओ,क्या पहनो वो ‘हम’ तय करेंगे” वाले दौर में हुकूमतों की आंख में आंख डालके पढ़ना इतना भी आसान नही है।
इस मुहाज़ पर इमरान मुशायरों की दुनिया मे वाहिद खड़ा नज़र आता है।
सत्ता के नशे में चूर तानाशाही सियासदानों को जब वो अपने शायराना अंदाज़ में आगाह करते हुए पढ़ता है….

“तू ज़ुल्म कहाँ तक ढायेगा, देखें किस हद तक जाएगा
हां! झूठ फ़ना होगा एक दिन,और सच का अलम लहराएगा”

तो मुशायरे में मौजूद सामईन के लहू में एक “उम्मीद” उबाल मारती है।

एक शायर में अवाम सिर्फ़ शायरी देखती है,
लेकिन इमरान में अवाम “कल” देखती है

अब देखना ये है कि आजतक अवाम की उम्मीदों पर खरा उतरने वाला ये नौजवान क्या आगे की “उम्मीद” पर खरा उतरता है या नही।

वैसे बहुतों का मानना है कि इमरान शायर नही है लेकिन हर दिन, किसी न किसी कोने से किसी मुशायरे की कुछ तस्वीरें दिखाई पड़ती हैं जो हमे इतना मानने पे तो मजबूर ही कर देती है कि इमरान “सिर्फ शायर” तो नही ही है।

नोट- ये लेख फ़ेसबुक के युवा लेखक अरमान खान के वाल से लिया गया है.

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