अर्थव्यवस्था

बैंको का एनपीए मोदी सरकार द्वारा राइट ऑफ करना सबसे बड़ा घोटाला क्यों और कैसे है

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BY, गिरीश मालवीय

मोदी सरकार से जब भी पूछा जाता है कि आप साल दर साल बैंको के एनपीए को राइट ऑफ क्यो कर रहे है ? उनका यही जवाब होता है कि राईट ऑफ का अर्थ कर्ज माफी नहीं है लोन लेने वालों पर कर्ज चुकाने का दायित्व बरकरार रहता है, कानूनी प्रक्रियाओं के तहत बकाया वसूली लगातार चलती रहती है?’

हालांकि इस बार उन्होंने एक और बड़ा झूठ बोला है कि ‘राइट-ऑफ से कर्जदारों को फायदा नहीं पहुंचता है. ‘वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ल ने यह झूठ संसद में बोला है जब उन्होंने बताया कि ‘देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्तवर्ष 2014-15 से सितंबर, 2017 तक 2.47 लाख करोड़ का एनपीए लोन राईट ऑफ कर दिया है.’

लाइव मिंट की रिपोर्ट बताती है कि पिछले साढ़े तीन सालों में 2 लाख 72 हजार 558 करोड़ की जो रकम राइट ऑफ की गयी. उसमे से सिर्फ 11 प्रतिशत यानी 29 हजार 343 करोड़ की रकम की ही रिकवरी की जा सकी यानी 2 लाख 43 हजार 215 करोड़ रुपये की रकम पूरी तरह से डूब गयी, अब आप यह बताइये कि इस रकम के डूबने का फायदा किसे मिला ?

क्या बैंको को मिला ?
क्या जनता को मिला ?
क्या भारत सरकार को मिला ?

इस रकम के डूबने के फायदा सिर्फ और सिर्फ उद्योगपतियों को मिला, उनके नाम तक डिस्क्लोज नहीं किये गए जिन्होंने यह 2 लाख 43 हजार 215 करोड़ रुपये की रकम डुबो दी, उन्हें फिर से अगली बार लोन मिल जाएगा क्योंकि इसके बारे में कुछ बताया ही नही गया. तभी कहा जाता हैं कि एनपीए की रकम को राइट ऑफ कर देना भारत का सबसे बड़ा घोटाला है.

अब आप समझिये की यह राइट ऑफ किये क्यो जाते है ? जबकि एनपीए हुई रकम को रिकवर करने के बैंकों के पास बहुत से तरीक़े मौजूद है ?

यह जानकारी एक ऐसे अधिकारी ने दी है जो खुद ऐसी ब्रांच में कार्यरत हैं जिसका काम एनपीए से ही संबंधित है और इस सम्बंध में उनका अनुभव दशको पुराना है. उनसे जब मैंने पूछा कि आखिर एनपीए को राइट ऑफ करने में उद्योगपति को क्या फायदा मिलता हैं तो उन्होंने पूरी बाते खोल कर रख दी उनका कहना था कि

‘लाइव लेजर में जब एनपीए अकाउंट होता है तो उसमें मैं ब्याज के पूरे मूलधन की रिकवरी होती है. आरबीआई के डायरेक्टिव के हिसाब से लाइव लेजर के एनपीए पर कोई स्कीम नहीं लाई जा सकती, कारपोरेट द्वारा अपनी बंधक संपत्ति को छुड़ाने का एक ही तरीका होता है कि लोन राइट ऑफ कर दो उसके बाद स्कीम लाकर लोन का खाता बंद कर दो.

जब लोन राइट ऑफ होता है तो लाइव लेजर से हट जाता है फिर भी रिकवरी की सारी प्रक्रियाएं बैंक के लिए खुली होती हैं. और रिकवरी के नाम पर खेल कर लिए जाते है, यानी बंधक संपत्ति न बेचकर ऋणी से समझौता करने की स्थिति में मूलधन का भी बड़ा भाग माफ़ कर दिया जाता है. ब्याज पूरा छोड़ दिया जाता है कानूनी प्रक्रियाओं में जो धन बैंक ने खर्च किए वह भी छोड़ दिया जाता हैं.

यानी राइट ऑफ के बाद स्कीम लाई जाती है उसमे कहा जाता है कि तुम्हारा पूरा ब्याज माफ और जितना मूलधन है उसके आधे से कम भी अगर दे दो तो लोन माफ. जबकि अगर बैंक बंधक संपत्ति की नीलामी करें तो पूरा मूलधन मय ब्याज के कानूनी खर्चों सहित राइट ऑफ के पहले ही जमा हो सकता है और राइट ऑफ के बाद भी. लेकिन इस ओर ध्यान नही दिया जाता यही सबसे बड़ा घोटाला है.

उनका साफ कहना था कि ‘बड़े कारपोरेट लोन में राइट ऑफ किया ही इसीलिए जाता है कि थोड़े दिन में इसकी स्कीम लाकर बंधक संपत्ति छुड़वा दी जाएगी.’

इस संदर्भ में यह आंकड़ा जान लेना समीचीन होगा कि बैंकों में बड़े उद्योगों के लिए कुल फंसा हुआ कर्ज यानी ग्रॉस एनपीए 33 महीने में 328 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है और 2012-13 के दौरान कुल मिलाकर सरकारी बैंकों ने 27231 करोड़ रुपए का लोन राइट ऑफ किया था. इसकी तुलना में 2016-17 में 81683 करोड़ रुपए लोन राइटऑफ किया गया. इस प्रकार इस दौरान इसमें करीब 5 गुना बढ़त दर्ज की गई है.

जब मैंने उनसे यह पूछा गया कि उद्योगपतियों के नाम न बताने की बात क्यो कही जाती है तो उनका कहना था कि ‘एक बार अगर किसी का लोन खराब हो गया और वह किसी दूसरी स्कीम के तहत बंद हुआ उसका सिबिल खराब हो जाता है और उसको कहीं से भी बैंक लोन नहीं मिल सकता इसीलिए कारपोरेट के नाम जाहिर नहीं किए जाते और ना ही उनका सिबिल खराब किया जाता है’

अब आप समझ सकते हैं कि मोदी सरकार से अपना ऋण राइट ऑफ करवा लेना बड़े उद्योगपतियों के लिए कितने फायदे का सौदा है, उनके नाम तक नही बताए जाते और इसीलिए मोदी सरकार के कार्यकाल में राइट ऑफ करने में पांच गुना की बढ़ोतरी हुई है.

यही है देश का सबसे बड़ा घोटाला.

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