समाज एंव संस्कृति

अब लालकिला को डालकिला कहा जाएगा और किताबों में इस तरह पढ़ाया जाएगा….

व्यंग्य

BY, हेमंत मालवीय

‘यू तो दिल्ली में कई ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल हैं। पर उनमे डालकिला उन ऐतिहासिक स्थलों में सबसे बढ़कर है। इसे वास्तुकला के प्रेमी एक मियां बादशाह आहजहां ने सन 1648 में बनवाया था। इस किले का निर्माण दाल के पत्थरों से करवाया गया है इसी कारण इसे कुछ लोग तुवरदाल ब्रांड डालकिला भी कहते हैं।

आगरा के तेजोमहालय के भाँती ही दिल्ली का यह डालकिला भी सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्द है। यह किला भाजपा शासकों के ‘बेचप्रेम’ का बेमिसाल नमूना है। यह कई एकड़ में फैला हुआ है। इसके दो मुख्य द्वार हैं। दोनों पर ही टिकट लगता है, अब रेट ओर बढ़ने वाले है

दालमंदिर वाले द्वार से प्रविष्ट होने पर इसकी आंतरिक भव्यता और बनावट आकर्षित करती है। इसके दोनों ओर बड़ी बड़ी दुकानें हैं। इसमें एक सड़क है जिससे होते हुए ऐसे स्थान पर पहुंचा जाता है जहां पर कभी गद्दार मुग़ल शासक अपना शाही दरबार लगाया करते थे। वे इस स्थान को दीवान-ए-आम कहते थे। दीवान-ए-आम का मतलब है आम की दीवानी जनता के लिए दरबार। यहां बादशाह के दीवान साहब आम जनता की शिकायतों और तकलीफों को सुना करते थे और उनके निवारण के लिए ट्विट किया करते थे

आजकल दिल्ली तो केजरी बादशाह के कब्जे में है , पर किला नही , यहीं पर जिस सिंहासन पर मुग़ल बादशाह बैठते थे उसे तख़्त-ए-खाउस या मयूर सिंहासन कहा जाता है। यह सिंहासन तमाम हीरे-जवाहरातों से जड़ा हुआ था। जिसे निकाल कर नीरव और मेहुल गितांजलि और नक्षत्र डायमंड के ब्रांड के नाम से बेच दिया करते थे , आजकल वे फरार है ,

इसके पश्चात् दीवान-ए-ख़ास आता है। यहां बादशाह अपने ख़ास मेहमानों, फाइनेंसरों, दलालों सेठो मंत्रीगणों, इमरती रानी, मंत्राणियो,एवं दरबारी और दरबारनियों आदि से मिला करते थे।

बीच मे ये 7 रेसकोर्स होता था आजकल ये 7 लोककल्याण मार्ग के नाम पर शिफ्ट हो गया है ,यहा ख़ास लोगों की सभा होती थी अतः इसमें आम लोगों का आना वर्जित था

डालकिले की बारह्दरियों की दीवारें सुन्दर चित्रकारी, विनाइल, फ्लेक्स, गुप्त रोग इलाज के लिए लिखे या मिले , जैसे विज्ञापन से सुसज्जित हैं। जिसमे कई कण्डोम कम्पनियो की ब्रंडिंग की गई है ,कजरिया टाइल्स, बिनानी सीमेंट से बना ये किला , एसियन पेंट से पुता हुआ है ,

जिसकी जेके वाल पुट्टी की दीवार बोल उठती है, ” हे कमीनो कम से कम इसे तो किराये पे चढ़ाने से तो बख्श देते”

इसमें कई ऐसे कक्ष हैं, जिनमे कहीं भविष्य के भाजपाई सम्राटो के वास का स्थान बना है तो कहीं उनकी बेगमों के लिए हरम बने हुए हैं। हर हरम कर्लोन के ओर स्लीपवेल के गद्दों से सुसज्जित है ,और कुछ कक्ष श्रृंगार कक्ष ,जहाँ पहले विको टर्मरिक हल्दी चन्दन अब पतंजलि हर्बल और हमाम कक्ष में हमाम और लक्स साबुन प्रयोग किये जाते थे। अब तो यह हमाम साबुन केवल स्मृति मात्र ही रह गए हैं

वर्तमान में डालकिला भारत सरकार के खुरातत्व विभाग की देख-रेख में है। इसके मुख्य द्वार की प्राचीर पर कभी तो ‘आओ गाँव रात में , उसी का खाना खाओ एक रात तो गुजारो दलित कन्या के साथ मे, के सन्देश लिखे हुए हैं

भारत के परीधानमन्त्री प्रतिवर्ष 15 अगस्त को तिरंगा झंडा यही फहराते हैं के जनता को सम्बोधित करते हैं। कुछ इस कदर करते हैं कि कुछ समय पहले तक लालकिले के अंदर जो भारतीय सेना के कार्यालय बने हुए थे अब उन्हें हटा लिया गया है। इसलिए की कही सेना अपने प्रधान मंत्री के भासन सुन सुन कर कहि जंग लड़ना ही केंसल न कर दे , क्योकि वे मन की बात से ही दुनिया जीत लेते हैं , सेना तो आजकल फ्री ही रहती है, किले के अंदर एक अजायबघर भी है जिसमें परिधान मंत्री की पोशाकें, दस लाख का सूट , महंगे जूते विदेशी परफ्यूम एवं अन्य वस्तुएं रखी गयीं है इसके लिए पूरा लाल किला छोटा पड़ रहा है

डालकिले में प्रकाश और ध्वनि का सुन्दर कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। जिसमे हनी सिंह, रफ्तार बादशाह के गाने सुनाए जाए है

बर्बाद हिन्द फ़ौज के अधिकारियों पर मुकदमा भी इसी लालकिले में ही चलाया गया था , उन पर आरोप था वे अच्छी भली अहिंसा से मिलने वाली आजादी की सेटिंग को बर्बाद करना चाहते थे ,

यह स्मारक भारत वर्ष की प्राचीन विकसित खापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। अब तो जब से 25 करोड़ में किराए पे डालमिया जी ने लिया है तो स्वतंत्र भारत में डालमियां जी का और डालकिले का गौरव और भी बढ़ गया है। प्रत्येक भारतवासी को डाल मियां जी पे और उनके डाल किले पर गर्व है। …….

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