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हिंदी चीनी  (छोटा)भाई -(बड़ा )भाई …!

भाई सिर्फ प्यार नहीं करते ।वह लड़ते भी हैं ।कभी एक-दूसरे को गरियाते हैं ,आंखें भी दिखाते हैं । सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि दोस्तों की तरह भाइयों का रिश्ता बराबरी का नहीं हो सकता। एक छोटा होता है और एक बड़ा ! और जाहिर है बड़ा  अक्सर छोटे को  ‘समझाता’ है ,कि वह बड़ा है !
नेहरू जब देश को  ‘ हिंदी चीनी भाई-भाई ‘  का भावुक नारा दे रहे थे  , तब क्या उन्होंने भाईयों के रिश्ते की इस बुनियादी मुश्किल के बारे में सोचा था ?  वह – ‘ हिंदी-चीनी दोस्त – दोस्त ‘ भी तो कह सकते थे। पर शायद चीन हमारा दोस्त नहीं ,भाई ही है ।एक चालू फिल्मी डायलॉग है  – “…भाई हमें मिलता है , पर दोस्त हम चुनते हैं !”   हमने चीन को चुना नहीं है। वह हमें मिला है ।दुनिया के ग्लोब में हमारे कंधे और सिर पर बैठा हुआ ।

तो जवाहर  क्या करते ? क्या भाई कहने के सिवा कोई चारा था उनके पास ?  1962 में अपने गुप्तचरों की सलाह पर फारवर्ड मार्च करके देख लिया था ! चार दिन में ही चीनी सेना सैकड़ों किलोमीटर अंदर घुस आई थी ! लाइन ऑफ कंट्रोल , लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल में बदल गई और सैकड़ों वर्ग किलोमीटर के इलाके पर चीन का कब्जा हो गया।
सलाम कीजिए ,भारतीय सेना के बहादुर सिपाहियों को जिन्होंने बहुत कम साजो-सामान के साथ चीन की आधुनिक बंदूकों की गोलियां छाती पर खाईं और कम से कम लद्दाख की रेजांगला चौकी को बचाया । 1962 लड़ाई में हार के कारण जानने के लिए दो बड़े फ़ौजी अफसरों को  विश्लेषण करने के लिए कहा गया था। उन्होंने जो रिपोर्ट सौंपी उसे आज तक जनता को नहीं दिखाया गया । अच्छा ही है ।दोबारा उस अपमान से गुजरने का क्या फायदा?

कई विद्वान मानते हैं कि नेहरू की नीतियां  रूमानी और आदर्शवादी थी । उन्हें लगता था कि वह विश्व के देशों को शांति का पाठ पढ़ा सकते हैं।उन्हें लगता था वह चीन के लिए अपना वीटो पावर त्याग कर देंगे और चीन भावुक होकर उन्हें गले लगा लेगा। हमने दलाई लामा को शरण दी !धर्मशाला में तिब्बत की गवर्नमेंट इन एग्जाइल  बनवाई! हमें लगा पूरा विश्व इसके लिए हमारी पीठ थपथपाएगा ! स्वर्ग से देवता फूल बरसाएंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ । 1966 में  माओ का चीन , सांस्कृतिक क्रांति के नाम पर लाखों तिब्बतियों का खून बहा रहा था ,तब सारे विश्व ने आंखों देखी मक्खी निगल ली । समरथ को दोष कौन देता ?  फिर अब तो चीन महाशक्ति है । ऐसे में अगर हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री बदले सुरों में भाईचारे के गीत गा रहे हैं  तो उन्हें अकेले को ही क्यों दोष दिया जाए ।

हमारे प्रधानमंत्री जी जब विपक्ष में थे । तो उन्होंने भी सरकार को ललकारा था – कि चीनियों को आंखें दिखाइए । सबक सिखाइए ।पर जल्द ही उन्होंने खुद विदेश नीति के सबक सीख लिए हैं। चाय की चुस्कियों ,नौका विहार और झूले की पींगो के बीच उन्होंने भी भाई को भाई मानना शुरू कर दिया है ।

हमें सीखना होगा कि इंसानों की तरह देश का जीवन भी भावुकता के सहारे नहीं चलता ।
डोकलाम पर ऐसा हल्ला मचाया गया कि लगने लगा था कि बस अब हम चीनी सैनिकों को बीजिंग तक खदेड़ने के बाद ही अगले चुनाव में वोट डालने जाएंगे । चीनी सामानों के बहिष्कार की ऐसी मार्मिक  अपील की गई कि लगा अपना चीनी मोबाइल डस्टबिन में डालने भर से चीन घुटनों पर बैठकर गिड़गिड़ाने लगेगा , माफियां मांगेगा । किसी ने यह नहीं जाना कि चीन के कुल निर्यात में भारत का हिस्सा बमुश्किल अढाई फ़ीसदी है। चीनी सेना दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ताकत है और हमारे यहां बोफोर्स के भूत ने ऐसा डर बैठाया है कि, पिछले कई वर्षों से सरकारें सेना का साजो सामान खरीदने से डरती हैं ।

पर दिल कहां मानता है । दुनिया के हर देश का हर वासी यही समझता है उसका देश सबसे महान है ।ऐसे में सच्चाई से मुंह मोड़ने की मोहलत हमें भी मिलनी चाहिए ।

किसी देश या सभ्यता के इतिहास में 100- 200 साल बहुत छोटा सा वक्त होता है । खुद को राहत देने के लिए आप याद कर सकते हैं कि महाशक्ति चीन को सिर्फ़ सत्तर अस्सी साल पहले तक जापान , पुर्तगाल और ब्रिटेन समेत कई देशों में लूटा खसोटा और भयानक जुल्म किए थे । ब्रिटेन ने तो सिर्फ इसलिए युद्ध छेड़ दिया था क्योंकि चीन ने इस बात का विरोध किया था कि ब्रिटेन  उनके देश में अफीम ना भेजे । इस युद्ध में चीन बुरी तरह हारा था और उसे न सिर्फ ब्रिटेन की शर्तों पर समझौता करना पड़ा बल्कि अपना एक महत्वपूर्ण बंदरगाह शहर हॉन्गकॉन्ग ब्रिटेन को देना पड़ा । यह 1840 की बात है ।इसके बाद लगातार सौ साल तक  साम्राज्यवादी ताकतों ने चीन को लूटा , इलाके छीने और बेइज्जत किया।
समय का चक्र कभी इस पलड़े में वजन रख देता है कभी उस में । हालात को समझना और स्वीकारना चाहिए। बेशक  हिंदी चीनी भाई-भाई है। और फ़िलहाल चीन बड़ा भाई है । हमें शांति और समझदारी से बड़ा होने की कोशिश करते रहना चाहिए ,और तब तक जोश में होश नहीं खोना चाहिए जब तक हम सचमुच बड़े नहीं हो जाते।

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